Saturday, August 3, 2013

Hoon sochta is desh ka to ...

                                                  हूँ सोचता इस देश का तो 


हूँ सोचता इस देश का तो समय गुजरता चला जाता है ,
       इसके उत्थान का कोई रास्ता मुझे तो समझ ना आता है 
नेता से कर्मचारी , डॉक्टर से अफ्सरदारी , हर कोई भ्रष्ट होता जाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 

आज देखो गाँव गाँव में बेटा पढने जाता है , माँ बाप में इतना प्यार नही जो बेटी को बस्ता पकड़ाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
 सोचता हूँ माँ बाप हो जाऊ , रूडियों का भय सताता है 

बहती गंगा जमुना में पाप हर कोई धुलवाता है , वापिस जा हरिद्वार से गरीबो का लहू चूसा जाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ पाप धो दूं मैं , पर  अब तो  गंगाजल ही मैला पाया जाता है 

क्या आज भी इस देश में रामावतार आता है , राम बेचारा क्या करेगा रावण सौ सर लगाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ राम बनूँ मैं पर रावण बहुत सताता है 

देखो दहेज़ उत्पीड़न का मुद्दा हर घर का किस्सा बताता है , लोभी को दहेज़ ना मिले तो बहु को सूली चढ़ाया जाता है , उसे जिन्दा जलाया जाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचू मैं के दहेज़ बन के दूर कही चला जाता हूँ , जितना दूर जाने की सोचू , पास खुद को पाटा हूँ 

आगे बदने की होड़ लगी है हर कोई ऊपर जाना चाहता है ,ऊपर जाने का रास्ता तो लाशों से होकर जाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ ऊपर उठूँ  मैं पर लाशें तो कौन चाहता है 

क्या ग्रेजुएट क्या पोस्ट ग्रेजुएट बेरोजगार नजर आता है ,हाथ में अपनी डिग्री पकडे चक्कर काटे जाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ रोजगार बनू मैं जो धूमिल सा हुए जाता है 

आज भ्रूण हत्या का सोचकर अंतर्मन धधक जाता है , डॉक्टर का तो क्या जाएगा वो तो नोट कमाता है , वो तो पाप कमाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ डॉक्टर बनू मैं , पर लालच बहुत डराता है 

शिक्षा का स्तर क्यों गिरा है अधिकारी बता नहीं पाता है , बच्चे स्कूल में चार पढ़ रहे मास्टर रजिस्टर पूरा बनाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ मास्टर बनू मैं , पर खाली स्कूल काटे जाता है 

राक्षश जिन्दा आज भी हैं ,सोच के मन दहलाता है , बार बार भारत में देखो निठारी होता जाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ देव बनू मैं पर राक्षस बहुत बड़ा नज़र आता है 

झूठा साम्राज्य फैला हुआ है सच कहीं नज़र ना आता है , हरिश्चन्द्र का असर तो बस ख़तम सा नज़र आता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ हरीश बनू मैं पर झूठ फन्न फैलाता है 

जाति जाति पर विवाद खड़े कर नेता संतुष्ट हो जाता है , दंगो से उसे क्या लेना वो अपनी कुर्सी बचाता है 
चाहता हूँ रोक दूं सब , पर अकेले पग भी ना बढ़ पाता  है 
सोचता हूँ मंत्री बन जाऊ  , कुर्सी में ही खोट नज़र आता है 

मिटटी से उठा था ऐ बन्दे , मिटटी में मिल जाना है , आज भी गर तू ना संभला तो खुदी का तू निशाना है 
तज  दे मुरख ये सब चक्कर , तुझे भारत वर्ष चमकाना है 
सूरज सदा चमकता रहता है , बस बादलो को हटाना है , इक नया सवेरा लाना है , हमें देश नया बनाना है ,हमें देश उदहारण बनाना है !!